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क्या ऐसे भी हालात नहीं!
मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ, दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अब हिज्र की कोई रात नहीं!
कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं, सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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चुपचाप उल्लास!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के एक अनूठे रचनाकार स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी की एक रचना प्रस्तुत कर रहा हूँ| बातचीत के सहज लहजे में गहरी बात कह देना भवानी दादा की विशेषता रही है| उनकी बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भवानीप्रसाद मिश्र जी…
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हिज्र ने नाशाद किया!
कुछ नहीं इसके सिवा ‘जोश’ हरीफ़ों का कलाम, वस्ल ने शाद किया हिज्र ने नाशाद किया| जोश मलीहाबादी
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लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया!
मेरी हर साँस है इस बात की शाहिद ऐ मौत, मैंने हर लुत्फ़ के मौक़े पे तुझे याद किया| जोश मलीहाबादी
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जब चली सर्द हवा!
दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया, जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया| जोश मलीहाबादी