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दीदार को अपने आम किया!
काश अब बुर्क़ा मुँह से उठा दे वर्ना फिर क्या हासिल है, आँख मुँदे पर उन ने गो दीदार को अपने आम किया| मीर तक़ी मीर
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दूर से देखता हूँ– रवींद्रनाथ ठाकुर
आज फिर से पुरानी ब्लॉग पोस्ट को दोहराने का दिन है, लीजिए प्रस्तुत है यह पोस्ट|आज मैं फिर से भारत के नोबल पुरस्कार विजेता कवि गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर की एक और कविता का अनुवाद प्रस्तुत कर रहा हूँ। यह उनकी अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित जिस कविता का भावानुवाद है, उसे अनुवाद के बाद प्रस्तुत…
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पाँच दिन की छुट्टी!
एक बार फिर से इंटरनेट से पाँच दिन के लिए दूर जा रहा हूँ|आज के बाद अगली पोस्ट या ऑनलाइन गतिविधि 2 मार्च को ही होगी|
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सबको यहीं से सलाम किया!
किसका काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम, कूचे के उसके बाशिंदों ने सबको यहीं से सलाम किया| मीर तक़ी मीर
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हम को अबस बदनाम किया!
नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की, चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया| मीर तक़ी मीर
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सुब्ह हुई आराम किया!
अहद-ए-जवानी रो रो काटा पीरी में लीं आँखें मूँद, या’नी रात बहुत थे जागे सुब्ह हुई आराम किया| मीर तक़ी मीर
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आख़िर काम तमाम किया!
उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया, देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया| मीर तक़ी मीर
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इश्क़ का मारा जाने है!
क्या क्या फ़ित्ने सर पर उसके लाता है माशूक़ अपना, जिस बे-दिल बे-ताब-ओ-तवाँ को इश्क़ का मारा जाने है| मीर तक़ी मीर
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इस दर्द का चारा जाने है!
चारागरी बीमारी-ए-दिल की रस्म-ए-शहर-ए-हुस्न नहीं, वर्ना दिलबर-ए-नादाँ भी इस दर्द का चारा जाने है| मीर तक़ी मीर