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आवाज़ों के खो जाने का दुख!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि एवं नवगीतकार श्री अनूप अशेष जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ| बाकी कविता अपना परिचय स्वयं देती है| लीजिए, प्रस्तुत श्री अनूप अशेष जी की यह रचना- आस-पास की आवाज़ों के खो जाने कादुख कितना।खालीपन कितना-कितना? बाँस-वनों के साँय-साँयसन्नाटों-सासब डूबा-डूबा,खुद में होकर भीजाने क्योंबस्ती का मन…
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गहराई कम वुसअ’त ज़ियादा थी!
वो दिल से कम ज़बाँ ही से ज़ियादा बात करता था, जभी उसके यहाँ गहराई कम वुसअ’त ज़ियादा थी| राजेश रेड्डी
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मगर क़ीमत ज़ियादा थी!
मयस्सर मुफ़्त में थे आसमाँ के चाँद तारे तक, ज़मीं के हर खिलौने की मगर क़ीमत ज़ियादा थी| राजेश रेड्डी
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हम में कुछ ग़ैरत ज़ियादा थी!
बुलंदी के लिए बस अपनी ही नज़रों से गिरना था, हमारी कम-नसीबी हम में कुछ ग़ैरत ज़ियादा थी| राजेश रेड्डी
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उसकी आँखों में हैरत ज़ियादा थी!
तअज्जुब में तो पड़ता ही रहा है आइना अक्सर, मगर इस बार उसकी आँखों में हैरत ज़ियादा थी| राजेश रेड्डी
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जिनके मुँह में ज़बान बाक़ी है!
सर क़लम होंगे कल यहाँ उनके, जिनके मुँह में ज़बान बाक़ी है| राजेश रेड्डी