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अरमान को रुस्वा कौन करे!
जब दिल में ज़रा भी आस न हो इज़्हार-ए-तमन्ना कौन करे, अरमान किए दिल ही में फ़ना अरमान को रुस्वा कौन करे| आनंद नारायण मुल्ला
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एक जमाने की कविता!
आज एक बार फिर मैं मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि श्री आलोक धन्वा जी की एक रचना, पहली बार शेयर कर रहा हूँ| बाकी कविता अपना परिचय स्वयं देती है| लीजिए, प्रस्तुत श्री आलोक धन्वा जी की यह रचना- वहाँ डाल पर फल पकते थेऔर उनसे रोशनी निकलती थी हम बहुत तेज़ दौड़ते थेमैदान…
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तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं!
ये बूढ़ी क़ब्रें तुम्हें कुछ नहीं बताएँगी, मुझे तलाश करो दोस्तो यहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं!
यहीं हुसैन भी गुज़रे यहीं यज़ीद भी था, हज़ार रंग में डूबी हुई ज़मीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं!
सितारो आओ मिरी राह में बिखर जाओ, ये मेरा हुक्म है हालाँकि कुछ नहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं!
वो इक किताब जो मंसूब तेरे नाम से है, उसी किताब के अंदर कहीं कहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं!
वो ज़र्रे ज़र्रे में मौजूद है मगर मैं भी, कहीं कहीं हूँ कहाँ हूँ कहीं नहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं!
मैं आइनों से तो मायूस लौट आया था, मगर किसी ने बताया बहुत हसीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं!
अजीब लोग हैं मेरी तलाश में मुझको, वहाँ पे ढूँड रहे हैं जहाँ नहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी
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उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं!
मैं लाख कह दूँ कि आकाश हूँ ज़मीं हूँ मैं, मगर उसे तो ख़बर है कि कुछ नहीं हूँ मैं| राहत इन्दौरी