आतिश-ए-गुल से बाग़!

हद्द-ए-नज़र तक सिर्फ़ धुआँ था बर्क़ पे क्यूँ इल्ज़ाम रखें,
आतिश-ए-गुल से बाग़ जला हो ऐसा भी हो सकता है|

मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद

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