कभी जब याद आ जाते!

आज मैं श्रेष्ठ हिंदी कवि तथा समीक्षक स्वर्गीय नामवर सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ।
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं।
आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नामवर सिंह जी का यह नवगीत –

कभी जब याद आ जाते

नयन को घेर लेते घन,
स्वयं में रह न पाता मन
लहर से मूक अधरों पर
व्यथा बनती मधुर सिहरन ।

न दुःख मिलता, न सुख मिलता
न जाने प्रान क्या पाते ।

तुम्हारा प्यार बन सावन,
बरसता याद के रसकन
कि पाकर मोतियों का धन
उमड़ पड़ते नयन निर्धन ।

विरह की घाटियों में भी
मिलन के मेघ मंडराते ।

झुका-सा प्रान का अम्बर,
स्वयं ही सिन्धु बन-बनकर
ह्रदय की रिक्तता भरता
उठा शत कल्पना जलधर ।

ह्रदय-सर रिक्त रह जाता
नयन घट किन्तु भर आते ।

कभी जब याद आ जाते ।


(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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3 responses to “कभी जब याद आ जाते!”

  1. शर्मा जी, नामवर सिंह जी का यह नवगीत स्मृति, विरह और प्रेम की अत्यंत सूक्ष्म अनुभूतियों को जिस सहजता से अभिव्यक्त करता है, वह मन को देर तक अपने साथ रखता है। यहाँ विरह केवल पीड़ा नहीं है; वह स्मृति के जल से भीगा हुआ एक ऐसा भाव है, जिसमें अनुपस्थिति के भीतर भी मिलन की आहट सुनाई देती है।

    “विरह की घाटियों में भी
    मिलन के मेघ मंडराते”

    इन पंक्तियों में जैसे पूरी रचना का भाव-सार उतर आया है। प्रिय की याद आती है तो नयन भर जाते हैं, किंतु मन के किसी कोने में वही स्मृति एक मधुर सुख भी जगा देती है। शायद प्रेम की यही सबसे गहरी विडंबना है जिसे पा नहीं सकते, उसकी याद ही कभी-कभी भीतर सबसे अधिक उपस्थित हो जाती है।

    आपकी प्रस्तुति का एक और सुंदर पक्ष यह है कि आपने रचना के स्रोत को लेकर अपनी भूमिका स्पष्ट की है। साहित्य साझा करना केवल शब्दों को आगे पहुँचाना नहीं, बल्कि उनके रचनाकार और स्रोत के प्रति सम्मान बनाए रखना भी है। कविता कोश और रेख़्ता जैसे साहित्यिक मंचों से रचनाएँ लेकर उन्हें पाठकों तक पहुँचाना इसी साहित्य-संवेदना को आगे बढ़ाता है।

    नामवर सिंह जी की यह रचना पढ़ते हुए लगा कुछ यादें आती नहीं हैं, वे भीतर उतरती हैं; और जब उतरती हैं, तो आँखों में बादल और हृदय में एक अनकहा सावन छोड़ जाती हैं।

    सादर नमस्कार शर्मा जी। 🙏

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    1. हार्दिक धन्यवाद, इतना डूबकर पढ़ने और itani

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  2. इतनी स्व अनुभूत प्रतिक्रिया देने वाले सुधी पाठक कम ही मिलते हैं.

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