नींदें उड़ा के सोया है!

अँधेरी शब के हवालों में उस को रक्खा है,
जो सारे शहर की नींदें उड़ा के सोया है|

वसीम बरेलवी

2 responses to “नींदें उड़ा के सोया है!”

  1. वाह! वसीम बरेलवी साहब की शायरी में कितनी गहराई है। बहुत ही उम्दा शेर!

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    1. सही बात है जी

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