ख़त्म अपना सफ़र न हो!

कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो।

बशीर बद्र

2 responses to “ख़त्म अपना सफ़र न हो!”

  1. बहुत खूब

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    1. हार्दिक आभार जी

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