कभी दिन की धूप में झूम के कभी शब के फूल को चूम के
यूँ ही साथ साथ चलें सदा कभी ख़त्म अपना सफ़र न हो।
बशीर बद्र
ख़त्म अपना सफ़र न हो!
One response to “ख़त्म अपना सफ़र न हो!”
-
बहुत खूब
LikeLike
Leave a reply to anupama shukla Cancel reply