जिधर जाएगी रात!

जो भी हैं पर्वर्दा-ए-शब जो भी हैं ज़ुल्मत परस्त,

वो तो जाएँगे उसी जानिब जिधर जाएगी रात|

सुरूर बाराबंकवी

One response to “जिधर जाएगी रात!”

  1. प्रत्येक मनुष्य को दैवीय बुराई की वास्तविकता को समझना चाहिए
    जब मनुष्य बुराई से संक्रमित होता है
    वह एक राक्षस बन जाता है जो किसी भी चीज़ से नहीं रुकता

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