तुम्हीं हो क्या बन्धु वह!

आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा तारसप्तक और अन्य सप्तकों के माध्यम से अनेक कवियों को बड़े आधार पर सामने वाले स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

अज्ञेय की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय जी की यह कविता –

तुम्हीं हो क्या बन्धु वह, जो हृदय में मेरे चिरन्तन जागता है?

काँप क्यों सहसा गया मेरा सतत विद्रोह का स्वर-
स्तब्ध अन्त:करण में रुक गया व्याकुल शब्द-निर्झर?
तुम्हीं हो क्या गान, जो अभिव्यंजना मुझ में अनुक्षण माँगता है?

खुल गया आक्षितिज नीलाकाश मेरी चेतना का,
छा गयी सम्मोहिनी-सी झिलमिलाती मुग्ध राका;
तुम्हीं हो क्या प्लवन वह आलोक का, जो सकल सीमा लाँघता है?

कहीं भीतर झर चले सब छद्म युग-युग की अपरिचिति के,
एक नूतन समन्वय में घुले सब आकार संसृति के;
तुम्हारा ही रूप धुँधला क्या सदा मानस-मुकुर में भासता है?

तुम्हीं हो क्या बन्धु वह, जो हृदय में मेरे चिरन्तन जागता है?

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “तुम्हीं हो क्या बन्धु वह!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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