चाँदनी!

आज मैं, हिन्दी के श्रेष्ठ रचनाकार तथा अज्ञेय जी द्वारा संपादित प्रमुख काव्य संकलन ‘तारसप्तक’ में भी शामिल कवि स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|

इनकी रचनाएं मैंने पहले शेयर नहीं की हैं|

लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राम विलास शर्मा जी की यह कविता –

चांदी की झीनी चादर सी

फैली है वन पर चांदनी

चांदी का झूठा पानी है

यह माह पूस की चांदनी

खेतों पर ओस-भरा कुहरा

कुहरे पर भीगी चांदनी

आँखों के बादल से आँसू

हँसती है उन पर चांदनी

दुख की दुनिया पर बुनती है

माया के सपने चांदनी

मीठी मुसकान बिछाती है

भीगी पलकों पर चांदनी

लोहे की हथकड़ियों-सा दुख

सपनों सी मीठी चांदनी

लोहे से दुख को काटे क्या

सपनों-सी मीठी चांदनी

यह चांद चुरा कर लाया है

सूरज से अपनी चांदनी

सूरज निकला अब चांद कहाँ

छिप गई लाज से चांदनी

दुख और कर्म का यह जीवन

वह चार दिनों की चांदनी

यह कर्म सूर्य की ज्योति अमर

वाह अंधकार की चांदनी

(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)

आज के लिए इतना ही,

नमस्कार| 

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2 responses to “चाँदनी!”

  1. नमस्कार 🙏🏻

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    1. नमस्कार जी

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