आज एक बार फिर से मैं, श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की एक रचना शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शलभ श्रीराम सिंह जी की यह कविता –

पृथ्वी हिलेगी नहीं इस बार
धधकेगी भी नहीं
डूब जाएगी अपने ही पानी में अकस्मात।
अपने विस्तार के साथ
अपने ही पानी में डूबी पृथ्वी
केवल प्रायश्चित करेगी शताब्दियों तक।
यह सब देखता रहेगा निरभ्र आकाश
नक्षत्र-लीला में ग्रह-विलय की तरह चुपचाप।
सूर्य के संस्पर्श की प्रतीक्षा करेगी
जल में समाधिस्थ वसुंधरा
निर्विकार-निश्छल-निर्लिप्त
मनुष्य के विषय में
कुछ भी न सोचती हुई
डूबी रहेगी अपने ही पानी में बहुत दिनों तक
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
********
Leave a reply to Peace Truth Cancel reply