करवट की गुंजाइश पर

मुँह मोड़ा और देखा कितनी दूर खड़े थे हम दोनों,

आप लड़े थे हम से बस इक करवट की गुंजाइश पर|

                गुलज़ार

2 responses to “करवट की गुंजाइश पर”

  1. बेहतरीन रचना

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    1. हार्दिक धन्यवाद जी

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