जब तेरी यादों का!

ज़ेहन की शाख़ों पर अशआर आ जाते हैं,

जब तेरी यादों का मौसम होता है|    

          जावेद अख़्तर

3 responses to “जब तेरी यादों का!”

  1. अशआर मेरे यूँ तो जमाने के लिए हैं, कुछ शेर फ़क़त उनको सुनाने के लिए हैं।

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    1. जी, बिलकुल

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