आज एक बार मैं वरिष्ठ हिन्दी नवगीतकार सुश्री शांति सुमन जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है सुश्री शांति सुमन जी की यह रचना –

अबके फिर गुलमोहर दहके
गाछों भर आग से लहके
किसी संझियाए पहर में
प्रतीक्षा-धुली दो आँखें
लाल-उजली मेघ पाखें
इस उन्मन दीखते शहर में
बनते ही बाहों के घेरे
सुरभि के संवाद से घनेरे
कजलायी आँख की लहर में
उतरेगा किसी हरी डार सा
दिन होगा पेड़ हरसिंगार का
सूर्य-बिम्ब पास की नहर में
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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