आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि, नवगीतकार और अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘तीसरा सप्तक’ में शामिल कवि स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|
इनकी कुछ सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं|
लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय केदारनाथ सिंह जी की यह रचना –

धूप चिड़चिड़ी, हवा बेहया,
दिन मटमैला
मौसम पर रंग चढ़ा फागुनी,
शिशिर टूटते
पत्तों में टूटा, पलाश वन
ज्यों फैला
एक उदासी का नभ
शोले चटक फूटते
जिस में अरमानों से गूँजा
हिया — आएगा
कल बसन्त, मन के भावों के
गीतकार-सा
गा जाएगा सबका कुछ-कुछ,
मौन छाएगा
गन्ध स्वरों से, गुड़ की गमक
हवा को सरसा
जाती जैसे पूस माह में,
नदिया होंगीं
व्यक्त तटों की हरियाली में
खिल, उघड़ा-सा
कहीं न दीखेगा जीवन,
लगते जो योगी
वे अनुभूति-पके तरु फूटेंगे,
जकड़ा-सा
तब भी क्या चुप रह जाएगा
प्यार हमारा ?
कुछ न कहेगा क्या वसन्त का
सन्ध्या-तारा ?
(आभार- एक बात मैं और बताना चाहूँगा कि अपनी ब्लॉग पोस्ट्स में मैं जो कविताएं, ग़ज़लें, शेर आदि शेयर करता हूँ उनको मैं सामान्यतः ऑनलाइन उपलब्ध ‘कविता कोश’ अथवा ‘Rekhta’ से लेता हूँ|)
आज के लिए इतना ही,
नमस्कार|
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