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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Sep 2022

    अब के बरस भी यहीं से निकलेगा!

    गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना, जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा!

    बुज़ुर्ग कहते थे इक वक़्त आएगा जिस दिन, जहाँ पे डूबेगा सूरज वहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा!

    इसी गली में वो भूखा फ़क़ीर रहता था, तलाश कीजे ख़ज़ाना यहीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा!

    मैं जानता था कि ज़हरीला साँप बन बन कर, तिरा ख़ुलूस मिरी आस्तीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा!

    न हम-सफ़र न किसी हम-नशीं से निकलेगा, हमारे पाँव का काँटा हमीं से निकलेगा| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ!

    इक न इक रोज़ कहीं ढूँढ ही लूँगा तुझको, ठोकरें ज़हर नहीं हैं कि मैं खा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    कमज़ोर शाख़ें कि हिला भी न सकूँ!

    फल तो सब मेरे दरख़्तों के पके हैं लेकिन, इतनी कमज़ोर हैं शाख़ें कि हिला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    बुलाया है कि जा भी न सकूँ!

    मिरी ग़ैरत भी कोई शय है कि महफ़िल में मुझे, उसने इस तरह बुलाया है कि जा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ!

    फूँक डालूँगा किसी रोज़ मैं दिल की दुनिया, ये तिरा ख़त तो नहीं है कि जला भी न सकूँ| राहत इन्दौरी

  • 23rd Sep 2022

    ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ!

    अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ, ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी न सकूँ| राहत इन्दौरी

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