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ग्रहण!
आज एक बार फिर से मैं हिन्दी के वरिष्ठ गीतकार श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत प्रस्तुत कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुदधिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – शहरी विज्ञापन ने हमसे सब-कुछ छीन लिया । आंगन का मटमैला…
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सह सकूँ न कह पाऊँ!
वो दर्द है कि जिसे सह सकूँ न कह पाऊँ, मिलेगा चैन तो अब जान से गुज़र के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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अजनबी हूँ महफ़िल में!
मुआ‘फ़ कीजे जो मैं अजनबी हूँ महफ़िल में, कि रास्ते नहीं मालूम इस नगर के मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी
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उदास करके मुझे!
किसी ने भी तो न देखा निगाह भर के मुझे, गया फिर आज का दिन भी उदास करके मुझे| मजरूह सुल्तानपुरी