-
जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ!
मैं हूँ भी और नहीं भी अजीब बात है ये, ये कैसा जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
-
सफ़र में किसी दयार में हूँ!
बस इतना होश है मुझको कि अजनबी हैं सब, रुका हुआ हूँ सफ़र में किसी दयार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
-
घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ!
मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं, मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
-
जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ!
ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ, तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी
-
चुलबुली किरण!
आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीत कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, रंजक जी हिन्दी नवगीत साहित्य की ऐसी अदभुद प्रतिभा थे जिन्होंने और भी बहुत से रचनाकारों को नवगीत लिखने के लिए प्रेरित किया| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत…