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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 18th Oct 2022

    जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ!

    मैं हूँ भी और नहीं भी अजीब बात है ये, ये कैसा जब्र है मैं जिसके इख़्तियार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    सफ़र में किसी दयार में हूँ!

    बस इतना होश है मुझको कि अजनबी हैं सब, रुका हुआ हूँ सफ़र में किसी दयार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ!

    मकाँ है क़ब्र जिसे लोग ख़ुद बनाते हैं, मैं अपने घर में हूँ या मैं किसी मज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ!

    ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ, तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    यार सबको बना लिया न करो!

    अपने रुत्बे का कुछ लिहाज़ ‘मुनीर’, यार सबको बना लिया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    लिखकर मिटा दिया न करो!

    उनसे निकलें हिकायतें शायद, हर्फ़ लिखकर मिटा दिया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    ज़ालिमों से गिला किया न करो!

    कुछ न होगा गिला भी करने से, ज़ालिमों से गिला किया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    उनमें जाकर मगर रहा न करो!

    ख़्वाब होते हैं देखने के लिए, उनमें जाकर मगर रहा न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    ग़म जुदाई में यूँ किया न करो!

    इतने ख़ामोश भी रहा न करो, ग़म जुदाई में यूँ किया न करो| मुनीर नियाज़ी

  • 18th Oct 2022

    चुलबुली किरण!

    आज एक बार फिर मैं अपने अत्यंत प्रिय नवगीत कवि स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ, रंजक जी हिन्दी नवगीत साहित्य की ऐसी अदभुद प्रतिभा थे जिन्होंने और भी बहुत से रचनाकारों को नवगीत लिखने के लिए प्रेरित किया| लीजिए, आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत…

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