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बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं!
नर्म अल्फ़ाज़ भली बातें मोहज़्ज़ब लहजे, पहली बारिश ही में ये रंग उतर जाते हैं| जावेद अख़्तर
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दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं!
छत की कड़ियों से उतरते हैं मिरे ख़्वाब मगर, मेरी दीवारों से टकरा के बिखर जाते हैं| जावेद अख़्तर
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कहें क्या कि किधर जाते हैं!
रास्ता रोके खड़ी है यही उलझन कब से, कोई पूछे तो कहें क्या कि किधर जाते हैं| जावेद अख़्तर
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फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं!
दर्द के फूल भी खिलते हैं बिखर जाते हैं, ज़ख़्म कैसे भी हों कुछ रोज़ में भर जाते हैं| जावेद अख़्तर
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न कहकर वो मुकर जाए तो कहना!
बहुत ख़ुश हो कि उसने कुछ कहा है, न कहकर वो मुकर जाए तो कहना| जावेद अख़्तर
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समझ में जब ये आ जाए तो कहना!
ये गुल काग़ज़ हैं ये ज़ेवर हैं पीतल, समझ में जब ये आ जाए तो कहना| जावेद अख़्तर
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दुनिया तुमको रास आए तो कहना!
ये दुनिया तुमको रास आए तो कहना, न सर पत्थर से टकराए तो कहना| जावेद अख़्तर
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डैमोक्रैसी!
आज एक बार फिर मैं हास्य व्यंग्य के श्रेष्ठ कवि और बहुत अच्छे संचालक श्री अशोक चक्रधर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| चक्रधर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री अशोक चक्रधर जी की यह कविता, जो आज की लोकतान्त्रिक व्यवस्था का बहुत सुंदर…