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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Dec 2022

    उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं!

    दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के ‘फ़राज़’, कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अम्बार से लग जाते हैं!

    कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं, घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं!

    पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है, फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं!

    इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है, बाद में सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं!

    रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं, दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अगर याद भी न आऊँ उसे!

    जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’, अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    वही जो राहत-ए-जाँ!

    वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ, तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    अब कहाँ से लाऊँ उसे!

    ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के, मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद!

    वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद, मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

  • 6th Dec 2022

    और गुनगुनाऊँ उसे!

    करूँ न याद मगर किस तरह भुलाऊँ उसे, ग़ज़ल बहाना करूँ और गुनगुनाऊँ उसे| अहमद फ़राज़

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