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उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं!
दाग़ दामन के हों दिल के हों कि चेहरे के ‘फ़राज़’, कुछ निशाँ उम्र की रफ़्तार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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अम्बार से लग जाते हैं!
कतरनें ग़म की जो गलियों में उड़ी फिरती हैं, घर में ले आओ तो अम्बार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं!
पहले पहले हवस इक-आध दुकाँ खोलती है, फिर तो बाज़ार के बाज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं!
इश्क़ आग़ाज़ में हल्की सी ख़लिश रखता है, बाद में सैंकड़ों आज़ार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं!
रोग ऐसे भी ग़म-ए-यार से लग जाते हैं, दर से उठते हैं तो दीवार से लग जाते हैं| अहमद फ़राज़
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अगर याद भी न आऊँ उसे!
जो हम-सफ़र सर-ए-मंज़िल बिछड़ रहा है ‘फ़राज़’, अजब नहीं है अगर याद भी न आऊँ उसे| अहमद फ़राज़
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वही जो राहत-ए-जाँ!
वही जो दौलत-ए-दिल है वही जो राहत-ए-जाँ, तुम्हारी बात पे ऐ नासेहो गँवाऊँ उसे| अहमद फ़राज़
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अब कहाँ से लाऊँ उसे!
ये लोग तज़्किरे करते हैं अपने लोगों के, मैं कैसे बात करूँ अब कहाँ से लाऊँ उसे| अहमद फ़राज़
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ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद!
वो ख़ार ख़ार है शाख़-ए-गुलाब की मानिंद, मैं ज़ख़्म ज़ख़्म हूँ फिर भी गले लगाऊँ उसे| अहमद फ़राज़