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ज़िंदगी भी मुहाल है!
मिरे दिल जिगर में समा भी जा रहे क्यों नज़र का भी फ़ासला, कि तिरे बग़ैर तो जान-ए-जाँ मुझे ज़िंदगी भी मुहाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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सुब्ह तेरा ख़याल है!
तिरे हुस्न पर है मिरी नज़र मुझे सुब्ह शाम की क्या ख़बर, मिरी शाम है तिरी जुस्तुजू मेरी सुब्ह तेरा ख़याल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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कब ये मजाल है!
मिरी हर ख़ुशी तिरे दम से है मिरी ज़िंदगी तिरे ग़म से है, तिरे दर्द से रहे बे-ख़बर मिरे दिल की कब ये मजाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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ज़िंदगी का सवाल है!
तुझे क्या सुनाऊँ मैं दिलरुबा तिरे सामने मिरा हाल है, तिरी इक निगाह की बात है मिरी ज़िंदगी का सवाल है| मजरूह सुल्तानपुरी
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प्रार्थना की कड़ी!
लंबे समय के बाद आज एक बार फिर से मैं साहित्य की सभी विधाओं में अपना योगदान करने वाले विख्यात कवि और ‘धर्मयुग’ के यशस्वी संपादक स्वर्गीय धर्मवीर भारती जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ| भारती जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय धर्मवीर भारती…
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वफ़ा साथ लिए जा!
शामिल है मिरा ख़ून-ए-जिगर तेरी हिना में, ये कम हो तो अब ख़ून-ए-वफ़ा साथ लिए जा| साहिर लुधियानवी
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घटा साथ लिए जा!
तपती हुई राहों से तुझे आँच न पहुँचे, दीवानों के अश्कों की घटा साथ लिए जा| साहिर लुधियानवी
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जो तुझे सौंप दिया था!
इक दिल था जो पहले ही तुझे सौंप दिया था, ये जान भी ऐ जान-ए-अदा साथ लिए जा| साहिर लुधियानवी
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दुआ साथ लिए जा!
बरबाद-ए-मोहब्बत की दुआ साथ लिए जा, टूटा हुआ इक़रार-ए-वफ़ा साथ लिए जा| साहिर लुधियानवी
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बहुत जी लिया मैंने!
बस अब तो दामन-ए-दिल छोड़ दो बेकार उम्मीदो, बहुत दुख सह लिए मैंने, बहुत दिन जी लिया मैंने| साहिर लुधियानवी