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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th May 2023

    वही चारा है इन दिनों!

    दिल को ग़म-ए-हयात गवारा है इन दिनों, पहले जो दर्द था वही चारा है इन दिनों| क़तील शिफ़ाई

  • 29th May 2023

    यह मधुमय देश हमारा!

    आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|  प्रसाद जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय जयशंकर प्रसाद जी की यह कविता – अरुण यह मधुमय देश हमारा।जहाँ पहुँच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।। सरल…

  • 28th May 2023

    इंतिज़ार कर शायद!

    जो भी बिछड़े वो कब मिले हैं ‘फ़राज़’, फिर भी तू इंतिज़ार कर शायद| अहमद फ़राज़

  • 28th May 2023

    बे-ख़बर शायद!

    ज़िंदगी भर लहू रुलाएगी, याद-ए-यारान-ए-बे-ख़बर शायद| अहमद फ़राज़

  • 28th May 2023

    तिरी नज़र शायद!

    अज्नबिय्यत की धुँद छट जाए, चमक उठ्ठे तिरी नज़र शायद| अहमद फ़राज़

  • 28th May 2023

    दोस्त ग़ौर कर शायद!

    जान-पहचान से भी क्या होगा, फिर भी ऐ दोस्त ग़ौर कर शायद| अहमद फ़राज़

  • 28th May 2023

    हम-सफ़र शायद!

    जिनके हम मुंतज़िर रहे उनको, मिल गए और हम-सफ़र शायद| अहमद फ़राज़

  • 28th May 2023

    वसंत श्री!

    आज मैं छायावाद युग के एक प्रमुख स्तंभ स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की एक कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ|  उनकी कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सुमित्रानंदन पंत जी की वसंत ऋतु पर लिखी यह कविता – उस फैली हरियाली में,कौन अकेली खेल रही मा!वह अपनी वय-बाली में?सजा…

  • 27th May 2023

    हम कभी मिल सकें

    फिर उसी रहगुज़ार पर शायद, हम कभी मिल सकें मगर शायद| अहमद फ़राज़

  • 27th May 2023

    ‘फ़राज़’ तुम भी अगर

    तवाफ़-ए-मंज़िल-ए-जानाँ हमें भी करना है, ‘फ़राज़’ तुम भी अगर थोड़ी दूर साथ चलो| अहमद फ़राज़

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