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वक़्त का मारा लगता है
‘कैफ़’ वो कल का ‘कैफ़’ कहाँ है आज मियाँ, ये तो कोई वक़्त का मारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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फूल कँवारा लगता है!
तितली चमन में फूल से लिपटी रहती है, फिर भी चमन में फूल कँवारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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इतना बेचारा लगता है!
किसको ख़बर ये कितनी क़यामत ढाता है, ये लड़का जो इतना बेचारा लगता है| कैफ़ भोपाली
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कितना प्यारा लगता है!
तेरा चेहरा सुब्ह का तारा लगता है, सुब्ह का तारा कितना प्यारा लग!ता है| कैफ़ भोपाली
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इनको चूमो!
आज मैं हिन्दी के एक श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी को साहित्य अकादमी पुरस्कार, भारत भारती पुरस्कार आदि अनेक सम्मान प्राप्त हुए थे| सुमन जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी…