-
शक्ल तो दिखा गया!
दयार-ए-दिल की रात में चराग़ सा जला गया, मिला नहीं तो क्या हुआ वो शक्ल तो दिखा गया| नासिर काज़मी
-
माँ!
आज एक बार फिर से मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक महत्वपूर्ण हिन्दी कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नरेश मेहता जी की कुछ कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नरेश मेहता जी की यह कविता – मैं नहीं…
-
कोई हिला भी नहीं!
वो चीख़ उभरी बड़ी देर गूँजी डूब गई, हर एक सुनता था लेकिन कोई हिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
-
अब गिला भी नहीं!
कभी जो तल्ख़-कलामी थी वो भी ख़त्म हुई, कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
-
कभी मिला भी नहीं!
कभी तो बात की उसने कभी रहा ख़ामोश, कभी तो हँस के मिला और कभी मिला भी नहीं| जावेद अख़्तर
-
कुछ हुआ भी नहीं!
कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ, कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं| जावेद अख़्तर
-
मिरा ख़ुदा भी नहीं!
मैं कब से कितना हूँ तन्हा तुझे पता भी नहीं, तिरा तो कोई ख़ुदा है मिरा ख़ुदा भी नहीं| जावेद अख़्तर