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वहीं इनकी बारगाहें!
तिरे ख़ानुमाँ-ख़राबों* का चमन कोई न सहरा, ये जहाँ भी बैठ जाएँ वहीं इनकी बारगाहें| *बर्बाद, मजरूह सुल्तानपुरी
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नक़्श-ए-पा से राहें!
कहीं ज़ुल्मतों में घिर कर है तलाश-ए-दश्त-ए-रहबर, कहीं जगमगा उठी हैं मिरे नक़्श-ए-पा से राहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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ये दबी दबी सी आहें!
ये रुके रुके से आँसू ये दबी दबी सी आहें, यूँही कब तलक ख़ुदाया ग़म-ए-ज़िंदगी निबाहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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दोपहरी!
आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ की एक महिला कवि स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| शकुंत जी की इस कविता में गर्मी के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीया शकुंत माथुर जी की यह कविता –…
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गए दिनों की लाश पर!
गए दिनों की लाश पर पड़े रहोगे कब तलक, अलम-कशो उठो कि आफ़्ताब सर पे आ गया| नासिर काज़मी
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ये मैं कहाँ समा गया!
ये किस ख़ुशी की रेत पर ग़मों को नींद आ गई, वो लहर किस तरफ़ गई ये मैं कहाँ समा गया| नासिर काज़मी
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मैं कहाँ चला गया!
ये सुब्ह की सफ़ेदियाँ ये दोपहर की ज़र्दियाँ, अब आइने में देखता हूँ मैं कहाँ चला गया| नासिर काज़मी
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कि आसमान खा गया!
पुकारती हैं फ़ुर्सतें कहाँ गईं वो सोहबतें, ज़मीं निगल गई उन्हें कि आसमान खा गया| नासिर काज़मी
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मुझे भी सब्र आ गया!
जुदाइयों के ज़ख़्म दर्द-ए-ज़िंदगी ने भर दिए, तुझे भी नींद आ गई मुझे भी सब्र आ गया| नासिर काज़मी
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लुत्फ़ भी चला गया!
वो दोस्ती तो ख़ैर अब नसीब-ए-दुश्मनाँ हुई, वो छोटी छोटी रंजिशों का लुत्फ़ भी चला गया| नासिर काज़मी