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उठे बादल !
आज एक बार फिर मैं अज्ञेय जी द्वारा संपादित ‘दूसरा सप्तक’ के एक कवि स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| व्यास जी की इस कविता में वर्षा के वातावरण का बहुत प्रभावी चित्रण किया गया है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय हरि नारायण व्यास जी की यह कविता…
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मिरी बेबसी पे रो देते!
जो देखते मिरी नज़रों पे बंदिशों के सितम, तो ये नज़ारे मिरी बेबसी पे रो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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सफ़ीना मिरा डुबो देते!
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना, किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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आरज़ू भी खो देते!
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए, हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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हम आस्तीं भिगो देते!
कहाँ वो शब कि तिरे गेसुओं के साए में, ख़याल-ए-सुब्ह से हम आस्तीं भिगो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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ग़म को भी समो देते!
मसर्रतों को ये अहल-ए-हवस न खो देते, जो हर ख़ुशी में तिरे ग़म को भी समो देते| मजरूह सुल्तानपुरी
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ये झुकी झुकी कुलाहें!
मिरे अहद में नहीं है ये निशान-ए-सरबुलंदी, ये रंगे हुए अमामे ये झुकी झुकी कुलाहें| मजरूह सुल्तानपुरी
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वहीं डाल दी हैं बाँहें!
कभी जादा-ए-तलब से जो फिरा हूँ दिल-शिकस्ता, तिरी आरज़ू ने हँस कर वहीं डाल दी हैं बाँहें| मजरूह सुल्तानपुरी