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भटकती क्यूँ है!
मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार
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बात खटकती क्यूँ है!
तुझसे मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार
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धूप के क़हर का डर!
धूप के क़हर का डर है तो दयार-ए-शब से, सर-बरहना कोई परछाईं निकलती क्यूँ है| शहरयार
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रंग बदलती क्यूँ है!
जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार
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पंजिम से पेंजेन्स!
जैसा मैंने पहले बताया है इस समय हम लंदन के अपने तीसरे प्रवास पर हैं, बेटे के घर पर| इस सप्ताहांत में एक बार फिर हम बाहर घूमने गए, यह यात्रा लंदन से बाहर की थी| सामान्यतः हम भारत में गोवा के पंजिम नगर में रहते हैं, समुद्र के किनारे और इस सप्ताहांत में हम…
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अब अंदर जाकर देख!
तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श बना कर देख!
शायद कोई देखने वाला हो जाए हैरान, कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख| मुनीर नियाज़ी
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पास बुला कर देख!
दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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दिया जला कर देख!
शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी