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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 1st Aug 2023

    भटकती क्यूँ है!

    मुझ से क्या पूछ रहे हो मिरी वहशत का सबब, बू-ए-आवारा से पूछो कि भटकती क्यूँ है| शहरयार

  • 1st Aug 2023

    बात खटकती क्यूँ है!

    तुझसे मिल कर भी न तन्हाई मिटेगी मेरी, दिल में रह रह के यही बात खटकती क्यूँ है| शहरयार

  • 1st Aug 2023

    बेगाना समझती क्यूँ है!

    मुझको अपना न कहा इसका गिला तुझ से नहीं, इसका शिकवा है कि बेगाना समझती क्यूँ है| शहरयार

  • 1st Aug 2023

    धूप के क़हर का डर!

    धूप के क़हर का डर है तो दयार-ए-शब से, सर-बरहना कोई परछाईं निकलती क्यूँ है| शहरयार

  • 1st Aug 2023

    रंग बदलती क्यूँ है!

    जब भी मिलती है मुझे अजनबी लगती क्यूँ है, ज़िंदगी रोज़ नए रंग बदलती क्यूँ है| शहरयार

  • 1st Aug 2023

    पंजिम से पेंजेन्स!

    जैसा मैंने पहले बताया है इस समय हम लंदन के अपने तीसरे प्रवास पर हैं, बेटे के घर पर| इस सप्ताहांत में एक बार फिर हम बाहर घूमने गए, यह यात्रा लंदन से बाहर की थी| सामान्यतः हम भारत में गोवा के पंजिम नगर में रहते हैं, समुद्र के किनारे और इस सप्ताहांत में हम…

  • 31st Jul 2023

    अब अंदर जाकर देख!

    तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख|    मुनीर नियाज़ी

  • 31st Jul 2023

    नक़्श बना कर देख!

    शायद कोई देखने वाला हो जाए हैरान, कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 31st Jul 2023

    पास बुला कर देख!

    दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 31st Jul 2023

    दिया जला कर देख!

    शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी

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