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बीमार कम कर दीजिए
सोचिए अब इतने चारागर कहाँ से आएँगे, मुस्कुरा कर अपने कुछ बीमार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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जब तवज्जोह ही नहीं!
जब तवज्जोह ही नहीं मौजूदगी किस काम की, इस कहानी में मिरा किरदार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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यार कम कर दीजिए!
दुश्मनों की ख़ुद-ब-ख़ुद हो जाएगी तादाद कम, यारों की फ़िहरिस्त में कुछ यार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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ख़लल अच्छा नहीं!
अपनी तन्हाई में इतना भी ख़लल अच्छा नहीं, आप अपने आप से गुफ़्तार* कम कर दीजिए| *Discussion राजेश रेड्डी
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बे-घरी का अपनी!
बे-घरी का अपनी ये इज़हार कम कर दीजिए, शे’र में ज़िक्र-ए-दर-ओ-दीवार कम कर दीजिए| राजेश रेड्डी
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आज पहली बार!
आज एक बार फिर से मैं अपने समय के अत्यंत श्रेष्ठ कवि और दिनमान पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सर्वेश्वर जी की बहुत सी कविताएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की यह कविता…
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छेड़ती गर्दिश-ए-चर्ख़!
और क्यूँ छेड़ती है गर्दिश-ए-चर्ख़*, वो नज़र फिर गई ये क्या कम है| *संकटों का चक्र फ़िराक़ गोरखपुरी
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वो ज़ुल्फ़ बरहम है!
जैसे उछले जुनूँ की पहली शाम, इस अदा से वो ज़ुल्फ़ बरहम* है| *तितर बितर फ़िराक़ गोरखपुरी