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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 3rd Sep 2023

    आँख मिला कर देख!

    तुझ से बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आकर देख, हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    अन-कहे सवाल की!

    देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए, दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    उस परी-जमाल की!

    उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी, हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    मेरे किसी ख़याल की!

    शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से, या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    शहर में डर था!

    शहर में डर था मौत का चाँद की चौथी रात को, ईंटों की इस खोह में दहशत थी भौंचाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    रेशम के रूमाल की!

    महक अजब सी हो गई पड़े पड़े संदूक़ में, रंगत फीकी पड़ गई रेशम के रूमाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    यही सदा घड़ियाल की!

    आई है अब याद क्या रात इक बीते साल की, यही हवा थी बाग़ में यही सदा घड़ियाल की| मुनीर नियाज़ी

  • 3rd Sep 2023

    तुम कहाँ हो!

    आज एक बार फिर से मैं हिन्दी काव्य मंचों पर अपनी तरह की अलग रचनाएं एक अनूठे अंदाज़ में प्रस्तुत करने वाले स्वर्गीय बलबीर सिंह ‘रंग’ जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं- आब ओ दाना रहे, रहे न रहे, ये ज़माना रहे, रहे न रहे तेरी महफ़िल…

  • 2nd Sep 2023

    रंग-ए-कलाम कहाँ!

    दिल पे जो बीते सह लेते हैं अपनी ज़बाँ में कह लेते हैं, ‘इंशा’-जी हम लोग कहाँ और ‘मीर’ का रंग-ए-कलाम कहाँ|   इब्न-ए-इंशा

  • 2nd Sep 2023

    पलभर चमके डूब गए

    साँझ-समय कुछ तारे निकले पल-भर चमके डूब गए, अम्बर अम्बर ढूँढ रहा है अब उन्हें माह-ए-तमाम कहाँ| इब्न-ए-इंशा

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