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अहद-ए-वफ़ा ने मेरे!
तू है किस हाल में ऐ ज़ूद-फ़रामोश* मिरे, मुझको तो छीन लिया अहद-ए-वफ़ा ने मेरे| *भुलक्कड़ अहमद फ़राज़
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अश्रु आचमन!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीतकार स्वर्गीय रमेश रंजक जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| रंजक जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय रमेश रंजक जी का यह नवगीत – अगर शपथ की परिधि न होतीमेरी पीरकथा हो जाती पिंजरे का…
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होते थे ज़माने मेरे!
आज इक और बरस बीत गया उसके बग़ैर, जिसके होते हुए होते थे ज़माने मेरे| अहमद फ़राज़
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ये भी ख़ज़ाने मेरे!
लुट के भी ख़ुश हूँ कि अश्कों से भरा है दामन, देख ग़ारत-गर-ए-दिल* ये भी ख़ज़ाने मेरे| *लुटे हुए दिल अहमद फ़राज़
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सुनाते हैं फ़साने मेरे!
ख़ल्क़* की बे-ख़बरी है कि मिरी रुस्वाई, लोग मुझको ही सुनाते हैं फ़साने मेरे| *दुनिया अहमद फ़राज़
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रोता रहा कोई!
शम्अ की लौ थी कि वो तू था मगर हिज्र* की रात, देर तक रोता रहा कोई सिरहाने मेरे| *जुदाई अहमद फ़राज़
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तू भी ख़ुशबू है मगर!
तू भी ख़ुशबू है मगर मेरा तजस्सुस* बेकार, बर्ग-ए-आवारा** की मानिंद ठिकाने मेरे| *तलाश, *उड़ता (आवारा) पत्ता अहमद फ़राज़