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अंदर जाकर देख!
तू भी ‘मुनीर’ अब भरे जहाँ में मिल कर रहना सीख, बाहर से तो देख लिया अब अंदर जाकर देख| मुनीर नियाज़ी
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नक़्श बना कर देख!
शायद कोई देखने वाला हो जाए हैरान, कमरे की दीवारों पर कोई नक़्श बना कर देख| मुनीर नियाज़ी
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पास बुला कर देख!
दरवाज़े के पास आ आ कर वापस मुड़ती चाप, कौन है इस सुनसान गली में पास बुला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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गाँव का परिचय!
आज एक बार फिर से मैं, अपनी अलग किस्म की रचनाओं के माध्यम से किसी समय हिन्दी काव्य मंचों पर धूम मचाने वाले स्वर्गीय शिशुपाल सिंह ‘निर्धन’ जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ| निर्धन जी की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं- एक पुराने दुख ने पूछा, क्या तुम अभी वहीं रहते हो, उत्तर दिया चले…
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दिया जला कर देख!
शाम है गहरी तेज़ हवा है सर पे खड़ी है रात, रस्ता गए मुसाफ़िर का अब दिया जला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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आँख मिला कर देख!
तुझ से बिछड़ कर क्या हूँ मैं अब बाहर आकर देख, हिम्मत है तो मेरी हालत आँख मिला कर देख| मुनीर नियाज़ी
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अन-कहे सवाल की!
देख के मुझ को ग़ौर से फिर वो चुप से हो गए, दिल में ख़लिश है आज तक इस अन-कहे सवाल की| मुनीर नियाज़ी
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उस परी-जमाल की!
उम्र के साथ अजीब सा बन जाता है आदमी, हालत देख के दुख हुआ आज उस परी-जमाल की| मुनीर नियाज़ी
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मेरे किसी ख़याल की!
शाम झुकी थी बहर पर पागल हो कर रंग से, या तस्वीर थी ख़्वाब में मेरे किसी ख़याल की| मुनीर नियाज़ी
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शहर में डर था!
शहर में डर था मौत का चाँद की चौथी रात को, ईंटों की इस खोह में दहशत थी भौंचाल की| मुनीर नियाज़ी