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सीनों पे छा के रह गईं!
झूम के फिर चलीं हवाएँ वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएँ, फिर तिरी याद की घटाएँ सीनों पे छा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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इमर्जेंसी!
आज शायद पहली बार मैं प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार और उपन्यासकार, ‘मैला आँचल’ के यशस्वी रचयिता स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और उनकी रचना ‘मारे गए गुलफाम’ पर ही शैलेंद्र जी ने फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई थी जिसमें स्वर्गीय राज कपूर…
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आँखें बिछा के रह गईं!
तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती, तारों की महफ़िलें भी आज आँखें बिछा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द सुना के रह गईं!
साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी* आज लरज़ लरज़ उठा, किसकी निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं| *ज़िंदगी का आनंद दिलाने वाला साज़ फ़िराक़ गोरखपुरी
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दर्द उठा के रह गईं!
याद कुछ आईं इस तरह भूली हुई कहानियाँ, खोए हुए दिलों में आज दर्द उठा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उनको रुला के रह गईं
और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला, हाँ तेरी शादमानियाँ* उनको रुला के रह गईं| *खुश होना फ़िराक़ गोरखपुरी
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शाने हिला के रह गईं!
उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें, ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता* के शाने हिला के रह गईं| *दुर्भाग्य फ़िराक़ गोरखपुरी
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नाम बता के रह गईं!
तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर, उनकी निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी
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उषस् (चार)!
आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय नरेश मेहता जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुबह होने की घटना ऐसी है जो निरंतर होती रहती है लेकिन अत्यंत दिव्य है| नरेश मेहता जी ने इस दिव्य घटना से प्रेरित होकर ‘उषस्’ शीर्षक सेचार रचनाएं लिखी हैं, जिनमें से यह…
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फ़ित्ने जगा के रह गईं!
पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ, फ़ित्ने* सुला के रह गईं फ़ित्ने* जगा के रह गईं| *उथल-पुथल फ़िराक़ गोरखपुरी