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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 12th Sep 2023

    सीनों पे छा के रह गईं!

    झूम के फिर चलीं हवाएँ वज्द में आईं फिर फ़ज़ाएँ, फिर तिरी याद की घटाएँ सीनों पे छा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 12th Sep 2023

    इमर्जेंसी!

    आज शायद पहली बार मैं प्रसिद्ध आंचलिक कथाकार और उपन्यासकार, ‘मैला आँचल’ के यशस्वी रचयिता स्वर्गीय फणीश्वर नाथ रेणु जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| रेणु जी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं और उनकी रचना ‘मारे गए गुलफाम’ पर ही शैलेंद्र जी ने फिल्म ‘तीसरी कसम’ बनाई थी जिसमें स्वर्गीय राज कपूर…

  • 11th Sep 2023

    आँखें बिछा के रह गईं!

    तुम नहीं आए और रात रह गई राह देखती, तारों की महफ़िलें भी आज आँखें बिछा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    दर्द सुना के रह गईं!

    साज़-ए-नशात-ए-ज़िंदगी* आज लरज़ लरज़ उठा, किसकी निगाहें इश्क़ का दर्द सुना के रह गईं| *ज़िंदगी का आनंद दिलाने वाला साज़ फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    दर्द उठा के रह गईं!

    याद कुछ आईं इस तरह भूली हुई कहानियाँ, खोए हुए दिलों में आज दर्द उठा के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    उनको रुला के रह गईं

    और तो अहल-ए-दर्द कौन सँभालता भला, हाँ तेरी शादमानियाँ* उनको रुला के रह गईं| *खुश होना फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    शाने हिला के रह गईं!

    उफ़ ये ज़मीं की गर्दिशें आह ये ग़म की ठोकरें, ये भी तो बख़्त-ए-ख़ुफ़्ता* के शाने हिला के रह गईं| *दुर्भाग्य फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    नाम बता के रह गईं!

    तारों की आँख भी भर आई मेरी सदा-ए-दर्द पर, उनकी निगाहें भी तिरा नाम बता के रह गईं| फ़िराक़ गोरखपुरी

  • 11th Sep 2023

    उषस् (चार)!

    आज एक बार फिर मैं हिन्दी के एक प्रमुख कवि स्वर्गीय नरेश मेहता  जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुबह होने की घटना ऐसी है जो निरंतर होती रहती है लेकिन अत्यंत दिव्य है| नरेश मेहता जी ने इस दिव्य घटना से प्रेरित होकर ‘उषस्’ शीर्षक सेचार रचनाएं लिखी हैं, जिनमें से यह…

  • 10th Sep 2023

    फ़ित्ने जगा के रह गईं!

    पूछ न उन निगाहों की तुर्फ़ा करिश्मा-साज़ियाँ, फ़ित्ने* सुला के रह गईं फ़ित्ने* जगा के रह गईं| *उथल-पुथल फ़िराक़ गोरखपुरी

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