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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 8th Mar 2024

    आँखों को हम ने!

    ये देख कर कि उन को है रंगीनियों का शौक़, आँखों को हम ने दीदा-ए-ख़ूँ-बार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 8th Mar 2024

    मुझ को वो बख़्शते थे!

    मुझ को वो बख़्शते थे दो आलम की नेमतें, मेरे ग़ुरूर-ए-इश्क़ ने इंकार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 8th Mar 2024

    बीमार कर दिया!

    दिल कुछ पनप चला था तग़ाफ़ुल* की रस्म से, फिर तेरे इल्तिफ़ात** ने बीमार कर दिया| *उपेक्षा, **उदारता जोश मलीहाबादी

  • 8th Mar 2024

    शुक्रतारा!

    अज्ञेय जी द्वारा संपादित तीसरा सप्तक के कवियों की रचनाएं शेयर करने के क्रम में आज मैं स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी एक ही रचना मैंने पहले शेयर की है| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय मदन वात्स्यायन जी की यह कविता – नए दूल्हे-सा सूरज, नववधू सा पीछे-पीछे…

  • 7th Mar 2024

    इंसाँ को और ग़म में!

    या रब ये भेद क्या है कि राहत की फ़िक्र ने, इंसाँ को और ग़म में गिरफ़्तार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 7th Mar 2024

    हुस्न-ए-दोस्त की!

    अल्लाह रे हुस्न-ए-दोस्त की आईना-दारियाँ, अहल-ए-नज़र को नक़्श-ब-दीवार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 7th Mar 2024

    ख़बरदार कर दिया!

    बेहोशियों ने और ख़बरदार कर दिया, सोई जो अक़्ल रूह ने बेदार कर दिया| जोश मलीहाबादी

  • 7th Mar 2024

    दिल में पल रही है!

    कभी तो इंसान ज़िंदगी की करेगा इज़्ज़त, ये एक उम्मीद आज भी दिल में पल रही है|  जावेद अख़्तर

  • 7th Mar 2024

    बस्ती भी जल रही है!

    न जलने पाते थे जिस के चूल्हे भी हर सवेरे, सुना है कल रात से वो बस्ती भी जल रही है| जावेद अख़्तर

  • 7th Mar 2024

    दीवार गल रही है!

    मैं क़त्ल तो हो गया तुम्हारी गली में लेकिन, मिरे लहू से तुम्हारी दीवार गल रही है| जावेद अख़्तर

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