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ख़ून से उजला करो!
दुख अँधेरों का अगर मिटता नहीं है ज़ेहन से, रात के दामन को अपने ख़ून से उजला करो| मंज़र भोपाली
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ख़्वाब मत देखा करो!
ज़िंदगी जीने का पहले हौसला पैदा करो, सिर्फ़ ऊँचे ख़ूबसूरत ख़्वाब मत देखा करो| मंज़र भोपाली
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जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला!
आज एक बार मैं विख्यात हिन्दी कवि स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| सुमन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिवमंगल सिंह सुमन जी की यह कविता- जिस-जिस से पथ पर स्नेह मिला,उस-उस राही को धन्यवाद। जीवन अस्थिर अनजाने ही,…
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नग़्मे बिखरने लगते हैं!
वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी, फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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जो अब भी तेरी गली!
हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है, जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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तुम्हारी याद के जब
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं, किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं| फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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अपने दिल का दर्द!
लब पे नग़्मा और रुख़ पर इक तबस्सुम की नक़ाब, अपने दिल का दर्द अब ‘मुल्ला’ को कहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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काँटों में रहना आ गया
एक ना-शुकरे चमन को रंग-ओ-बू देता रहा, आ गया हाँ आ गया काँटों में रहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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रंज सहना आ गया!
पी के आँसू सी के लब बैठा हूँ यूँ इस बज़्म में, दर-हक़ीक़त जैसे मुझ को रंज सहना आ गया| आनंद नारायण मुल्ला
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अरुणाचल!
आज एक बार मैंहिन्दी नवगीत के शिखर पुरुष स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| शंभुनाथ जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शंभुनाथ सिंह जी का यह नवगीत- पर्वत से छन कर झरता है पानी,जी भर कर पियोऔर पियो । घाटी-दर-घाटी ऊपर…