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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 29th Sep 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-3

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

  • 28th Sep 2024

    मैं रहूँ या न रहूँ!

    मैं रहूँ या न रहूँ नाम रहेगा मेरा,ज़िंदगी उम्र में कुछ मुझ से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    तू मिरे साथ अगर है !

    तू मिरे साथ अगर है तो अंधेरा कैसा,रात ख़ुद चाँद सितारों से जड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    ख़ुशनुमा लगते हैं!

    ख़ुशनुमा लगते हैं दिल पर तिरे ज़ख़्मों के निशाँ,बीच दीवार में जिस तरह घड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    अभी दुनिया हमें!

    हम भी अपने को बदल डालेंगे रफ़्ता रफ़्ता,अभी दुनिया हमें जन्नत से बड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    जैसे सावन के महीने!

    ऐसे रोया था बिछड़ते हुए वो शख़्स कभी,जैसे सावन के महीने में झड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    तू जहाँ होता है!

    सारी दौलत तिरे क़दमों में पड़ी लगती है,तू जहाँ होता है क़िस्मत भी गड़ी लगती है| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    अपने सिवा किसी से!

    ‘एहसान’ कौन मुझ से सिवा है मिरा अदू,अपने सिवा किसी से शिकायत नहीं मुझे| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    ये ऐसा ज़ख़्म है जो!

    ये ऐसी चोट है जिस को हमेशा दुखते रहना है,ये ऐसा ज़ख़्म है जो उम्र भर अच्छा नहीं होगा| मुनव्वर राना

  • 28th Sep 2024

    मेरी कुछ और रचनाएं-2

    एक बार फिर से कुछ पुरानी रचनाएं मिल गईं सोचा इनको भी ढोल पीट लेता हूँ, क्योंकि बहुत समय पहले 1980 में दिल्ली छोड़ दी थी और रचनाकर्म भी लगभग छूट ही गया था| अधिकतर सुदूर प्रोजेक्ट्स में रहा और अब 7 से अधिक वर्षों से गोवा में रह रहा हूँ, जहां साहित्यिक सपोर्ट और…

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