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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 17th Oct 2024

    उमीदों से भरोसों से !

    ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    हमारे ज़ख़्म-ए-दिल!

    हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    फूलों से सितारों से!

    हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से,शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    आँख चुरा कर जा न!

    दिल को चुराया ख़ैर चुराया,आँख चुरा कर जा न लुटेरे| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    पाँव न पड़वा तेरे मेरे!

    हम तो हैं तेरे पूजने वाले,पाँव न पड़वा तेरे मेरे| कैफ़ भोपाली

  • 17th Oct 2024

    बँसबिट्टी में!

    आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ और श्रेष्ठ गीत कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|   मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की यह कविता  –  बँसबिट्टी में कोयल बोलेमहुआ डाल महोखाआया कहाँ बसन्त…

  • 16th Oct 2024

    हसीं हैं आज अंधेरे!

    सामने वो हैं ज़ुल्फ़ बिखेरे,कितने हसीं हैं आज अंधेरे| कैफ़ भोपाली

  • 16th Oct 2024

    गली के सौ सौ फेरे!

    काम यही है शाम सवेरे,तेरी गली के सौ सौ फेरे| कैफ़ भोपाली

  • 16th Oct 2024

    उसको लिखूँ दिन!

    जाने ये कैसा दौर है जिस में जुरअत भी तो मुश्किल है,उस को लिखूँ दिन रात अगर हो रात लिखूँ| जावेद अख़्तर

  • 16th Oct 2024

    अपनी अपनी तारीकी!

    अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं,तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौमें फ़िरक़े ज़ात लिखूँ| जावेद अख़्तर

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