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उमीदों से भरोसों से !
ज़माने में कभी भी क़िस्मतें बदला नहीं करतीं,उमीदों से भरोसों से दिलासों से सहारों से| कैफ़ भोपाली
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हमारे ज़ख़्म-ए-दिल!
हमारे ज़ख़्म-ए-दिल दाग़-ए-जिगर कुछ मिलते-जुलते हैं,गुलों से गुल-रुख़ों से महवशों से माह-पारों से| कैफ़ भोपाली
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फूलों से सितारों से!
हम उन को छीन कर लाए हैं कितने दावेदारों से,शफ़क़ से चाँदनी-रातों से फूलों से सितारों से| कैफ़ भोपाली
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बँसबिट्टी में!
आज एक बार फिर मैं देश के वरिष्ठ और श्रेष्ठ गीत कवि श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी की यह कविता – बँसबिट्टी में कोयल बोलेमहुआ डाल महोखाआया कहाँ बसन्त…
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उसको लिखूँ दिन!
जाने ये कैसा दौर है जिस में जुरअत भी तो मुश्किल है,उस को लिखूँ दिन रात अगर हो रात लिखूँ| जावेद अख़्तर
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अपनी अपनी तारीकी!
अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं,तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौमें फ़िरक़े ज़ात लिखूँ| जावेद अख़्तर