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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 22nd Nov 2024

    मंज़िलें चूमती हैं!

    मंज़िलें चूमती हैं मेरे क़दम,दाद दीजे शिकस्ता-पाई की| राहत इंदौरी

  • 22nd Nov 2024

    ओढ़ कर ख़ुद को!

    सोए रहते हैं ओढ़ कर ख़ुद को,अब ज़रूरत नहीं रज़ाई की| राहत इंदौरी

  • 22nd Nov 2024

    शुरूआ’त जुदाई की!

    टूट कर हम मिले हैं पहली बार,ये शुरूआ’त है जुदाई की| राहत इंदौरी

  • 22nd Nov 2024

    सूरत नहीं रिहाई की!

    खुले रहते हैं सारे दरवाज़े,कोई सूरत नहीं रिहाई की| राहत इंदौरी

  • 22nd Nov 2024

    हो न सके खुलकर!

    आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नईम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत  –  हो न सके खुलकर अपनों से,वो भी कब किसके हो पाये ? बीच धार में खड़े…

  • 21st Nov 2024

    सैकड़ों बार बेवफ़ाई!

    मैं ने दुनिया से मुझ से दुनिया ने,सैकड़ों बार बेवफ़ाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    अपनी रहनुमाई की!

    हम ने ख़ुद अपनी रहनुमाई की,और शोहरत हुई ख़ुदाई की| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    लहू लहू हम थे!

    ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर,जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    हमारा ज़िक्र भी अब!

    हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ, दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे| राहत इंदौरी

  • 21st Nov 2024

    कभू कभू हम थे!

    ज़मीं पे लड़ते हुए आसमाँ के नर्ग़े में,कभी कभी कोई दुश्मन कभू कभू हम थे| राहत इंदौरी

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