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हो न सके खुलकर!
आज मैं हिन्दी के श्रेष्ठ नवगीत कवि स्वर्गीय नईम जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| नईम जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय नईम जी का यह नवगीत – हो न सके खुलकर अपनों से,वो भी कब किसके हो पाये ? बीच धार में खड़े…
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हमारा ज़िक्र भी अब!
हमारा ज़िक्र भी अब जुर्म हो गया है वहाँ, दिनों की बात है महफ़िल की आबरू हम थे| राहत इंदौरी