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एक किरन भोर की!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत – एक किरन भोर कीउतराई आँगने ।रखना इसको सँभाल कर,लाया हूँ माँग इसेसूरज के गाँव सेअँधियारे…
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मेरे अहद के इंसानों!
मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं,ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम
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छुपे हुए उलझाव!
अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम
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सोच का है ये फेर!
सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम
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आज दबाव बहुत!
बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर,बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम