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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Dec 2024

    आँखों में जो सवेरा था!

    वो भी पथरा के रह गया आख़िर,उस की आँखों में जो सवेरा था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    आँगन में रौशनी थी!

    उस के आँगन में रौशनी थी मगर,घर के अंदर बड़ा अंधेरा था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    एक किरन भोर की!

    आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी गीतकार श्री बुद्धिनाथ मिश्र  जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ|   मिश्र जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है श्री बुद्धिनाथ मिश्र जी का यह नवगीत –  एक किरन भोर कीउतराई आँगने ।रखना इसको सँभाल कर,लाया हूँ माँग इसेसूरज के गाँव सेअँधियारे…

  • 4th Dec 2024

    रेत का घरौंदा था!

    रंज क्या ख़्वाब के बिखरने का,कुछ न था रेत का घरौंदा था| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    आँखों में क़हक़हा सा!

    जिस ने दुनिया को ख़ूब देखा था,उस की आँखों में क़हक़हा सा था| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    सबका बहुत चहीता!

    वो जो सब का बहुत चहीता था,क़ब्र की साअ’तों में तन्हा था| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    मेरे अहद के इंसानों!

    मेरे अहद के इंसानों को पढ़ लेना कोई खेल नहीं,ऊपर से है मेल-मोहब्बत, अंदर से है खिंचाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    छुपे हुए उलझाव!

    अपने-आप में उलझी हुई इक दुनिया है हर शख़्स यहाँ,सुलझे हुए ज़ेहनों में भी हैं छुपे हुए उलझाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    सोच का है ये फेर!

    सोच का है ये फेर कि यारो पेच-ओ-ख़म की दुनिया में,ढूँड रहे हो ऐसा रस्ता जिस में नहीं घुमाव बहुत| क़ैसर शमीम

  • 4th Dec 2024

    आज दबाव बहुत!

    बहके बहके से बादल हैं क्या जाने ये जाएँ किधर,बदली हुई हवाओं का है उन पर आज दबाव बहुत| क़ैसर शमीम

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