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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 6th Dec 2024

    मगर जब याद आते हैं!

    नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती,मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं| हसरत मोहानी

  • 6th Dec 2024

    बराबर याद आते हैं!

    भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं,इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं| हसरत मोहानी

  • 6th Dec 2024

    ख़ुशबू का बाँटने!

    एक ख़ुशबू का बाँटने वाला,गंदी बस्ती का रहने वाला था| क़ैसर शमीम

  • 6th Dec 2024

    ज़माना आ गया!

    आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की यह ग़ज़ल- ज़माना आ गया रुसवाइयों तक तुम नहीं आए ।जवानी आ गई तनहाइयों तक तुम…

  • 5th Dec 2024

    पुल न था और सामने!

    पुल न था और सामने उस के,एक तूफ़ाँ-ब-दोश दरिया था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    चीख़ कौन सुनता था!

    क़हक़हों की बरात निकली थी,दर्द की चीख़ कौन सुनता था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    सहमा हुआ परिंदा था!

    शाख़ झुलसी हुई थी और उस पर,एक सहमा हुआ परिंदा था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    एक पिंजरा उदास!

    एक पिंजरा उदास तन्हाई,उस ने क्या क्या ख़ुदा से माँगा था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    आँखों में जो सवेरा था!

    वो भी पथरा के रह गया आख़िर,उस की आँखों में जो सवेरा था| क़ैसर शमीम

  • 5th Dec 2024

    आँगन में रौशनी थी!

    उस के आँगन में रौशनी थी मगर,घर के अंदर बड़ा अंधेरा था| क़ैसर शमीम

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