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कहीं पाया न ठिकाना!
हम ने छानी हैं बहुत दैर ओ हरम की गलियाँ,कहीं पाया न ठिकाना तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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लौह दिल को ग़म!
लौह दिल को ग़म-ए-उल्फ़त को क़लम कहते हैं,कुन है अंदाज़-ए-रक़म हुस्न के अफ़्साने का| फ़ानी बदायुनी
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हँसो भाई पेड़!
आज मैं नवगीत विधा के प्रसिद्ध हस्ताक्षर स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का एक नवगीत शेयर कर रहा हूँ| तिवारी जी की अनेक रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय माहेश्वर तिवारी जी का यह नवगीत – कहती है दूबहँसो भाई पेड़बाहर जितना देखते होधरती मेंधसों भाई पेड़ । जड़ें बहुत…
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लिए जाते हैं जनाज़ा!
हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में,लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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दिल से पहुँची तो हैं!
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें,सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का| फ़ानी बदायुनी
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आओ देखो न तमाशा!
तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग,आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी
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मिरे मर जाने का|!
ज़िंदगी भी तो पशेमाँ है यहाँ ला के मुझे,ढूँडती है कोई हीला मिरे मर जाने का| फ़ानी बदायुनी
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इस अफ़्साने का!
मुख़्तसर क़िस्सा-ए-ग़म ये है कि दिल रखता हूँ,राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा है इस अफ़्साने का| फ़ानी बदायुनी