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रंगीनियों में डूब गया!
अल्लाह-री जिस्म-ए-यार की ख़ूबी कि ख़ुद-ब-ख़ुद,रंगीनियों में डूब गया पैरहन तमाम| हसरत मोहानी
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सीख लिए हैं चलन!
हैरत ग़ुरूर-ए-हुस्न से शोख़ी से इज़्तिराब,दिल ने भी तेरे सीख लिए हैं चलन तमाम| हसरत मोहानी
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बढ़ कर याद आते हैं!
हक़ीक़त खुल गई ‘हसरत’ तिरे तर्क-ए-मोहब्बत की,तुझे तो अब वो पहले से भी बढ़ कर याद आते हैं| हसरत मोहानी
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मगर जब याद आते हैं!
नहीं आती तो याद उन की महीनों तक नहीं आती,मगर जब याद आते हैं तो अक्सर याद आते हैं| हसरत मोहानी
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बराबर याद आते हैं!
भुलाता लाख हूँ लेकिन बराबर याद आते हैं,इलाही तर्क-ए-उल्फ़त पर वो क्यूँकर याद आते हैं| हसरत मोहानी
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ज़माना आ गया!
आज मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ| रंग जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बलबीर सिंह रंग जी की यह ग़ज़ल- ज़माना आ गया रुसवाइयों तक तुम नहीं आए ।जवानी आ गई तनहाइयों तक तुम…