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क्रान्तिकारी अकेला था!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि और समीक्षक स्वर्गीय भारत यायावर जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| यायावर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत यायावर जी की यह कविता- क्रान्तिकारी अकेला थासोच रहा थाइतनी क्रान्तियाँ करके भी अकेला हूँक्यों अकेला…
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औरों का हाथ थामो!
औरों का हाथ थामो उन्हें रास्ता दिखाओ,मैं भूल जाऊँ अपना ही घर तुम को इस से क्या परवीन शाकिर
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कट जाएँ मेरी सोच के!
तुम मौज मौज मिस्ल-ए-सबा घूमते रहोकट जाएँ मेरी सोच के पर तुम को इस से क्या परवीन शाकिर
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टूटी है मेरी नींद मगर!
टूटी है मेरी नींद मगर तुम को इस से क्या,बजते रहें हवाओं से दर तुम को इस से क्या परवीन शाकिर
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फैलेगी यूँ ही शोरिश!
अच्छा है अहल-ए-जौर किए जाएँ सख़्तियाँ,फैलेगी यूँ ही शोरिश-ए-हुब्ब-ए-वतन तमाम| हसरत मोहानी
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गुलज़ार बन गई है !
उस नाज़नीं ने जब से किया है वहाँ क़याम,गुलज़ार बन गई है ज़मीन-ए-दकन तमाम| हसरत मोहानी
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है नाज़-ए-हुस्न से जो!
है नाज़-ए-हुस्न से जो फ़रोज़ाँ जबीन-ए-यार,लबरेज़ आब-ए-नूर है चाह-ए-ज़क़न तमाम| हसरत मोहानी
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बेहोश इक नज़र में !
देखो तो चश्म-ए-यार की जादू-निगाहियाँ,बेहोश इक नज़र में हुई अंजुमन तमाम| हसरत मोहानी
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मधुमय स्वप्न रंगीले!
आज एक बार फिर मैं श्रेष्ठ हिन्दी कवि स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| नवीन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं| लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा नवीन जी की यह कविता- बन-बनकर मिट गए अनेकों मेरे मधुमय स्वप्न रंगीलेभर-भरकर फिर-फिर सूखे हैं…
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दिल ख़ून हो चुका है!
दिल ख़ून हो चुका है जिगर हो चुका है ख़ाक, बाक़ी हूँ मैं मुझे भी कर ऐ तेग़-ज़न तमाम| हसरत मोहानी