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लिए जाते हैं जनाज़ा!
हड्डियाँ हैं कई लिपटी हुई ज़ंजीरों में,लिए जाते हैं जनाज़ा तिरे दीवाने का| फ़ानी बदायुनी
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दिल से पहुँची तो हैं!
दिल से पहुँची तो हैं आँखों में लहू की बूँदें,सिलसिला शीशे से मिलता तो है पैमाने का| फ़ानी बदायुनी
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आओ देखो न तमाशा!
तुम ने देखा है कभी घर को बदलते हुए रंग,आओ देखो न तमाशा मिरे ग़म-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी
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मिरे मर जाने का|!
ज़िंदगी भी तो पशेमाँ है यहाँ ला के मुझे,ढूँडती है कोई हीला मिरे मर जाने का| फ़ानी बदायुनी
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इस अफ़्साने का!
मुख़्तसर क़िस्सा-ए-ग़म ये है कि दिल रखता हूँ,राज़-ए-कौनैन ख़ुलासा है इस अफ़्साने का| फ़ानी बदायुनी
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चलते चलते!
आज मैं प्रसिद्ध हिन्दी कवि स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की एक कविता शेयर कर रहा हूँ| इनकी कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय भारत भूषण अग्रवाल जी की यह कविता- मैं चाह रहा हूँ, गाऊँ केवल एक गान, आख़िरी समयपर जी में गीतों की भीड़ लगीमैं चाह…
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मेरे सनम-ख़ाने का!
का’बे को दिल की ज़ियारत के लिए जाता हूँ,आस्ताना है हरम मेरे सनम-ख़ाने का| फ़ानी बदायुनी
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भेस है परवाने का!
हुस्न है ज़ात मिरी इश्क़ सिफ़त है मेरी, हूँ तो मैं शम्अ मगर भेस है परवाने का| फ़ानी बदायुनी