-
केवल दो गीत लिखे!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ गीतकार स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। राजन जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय राजेंद्र राजन जी का यह गीत– केवल दो गीत लिखे मैंनेइक गीत तुम्हारे मिलने काइक गीत तुम्हारे खोने का। सड़कों-सड़कों, शहरों-शहरोंनदियों-नदियों, लहरों-लहरोंविश्वास…
-
सीने में इक आग थी!
कभी जो सीने में इक आग थी वो सर्द हुई, कभी निगाह में जो था शरार जाता रहा| जावेद अख़्तर
-
ख़ुमार जाता रहा!
किसी की आँख में मस्ती तो आज भी है वही, मगर कभी जो हमें था ख़ुमार जाता रहा| जावेद अख़्तर
-
ख़ुलूस तो है मगर!
खुला है दर प तिरा इंतिज़ार जाता रहा,ख़ुलूस तो है मगर ए’तिबार जाता रहा| जावेद अख़्तर
-
अगर हो रात लिखूँ!
जाने ये कैसा दौर है जिस में जुरअत भी तो मुश्किल है,दिन हो अगर तो उस को लिखूँ दिन रात अगर हो रात लिखूँ| जावेद अख़्तर
-
फ़िरक़े ज़ात लिखूँ!
अपनी अपनी तारीकी को लोग उजाला कहते हैं,तारीकी के नाम लिखूँ तो क़ौमें फ़िरक़े ज़ात लिखूँ| जावेद अख़्तर
-
इनको जज़्बात लिखूँ!
तख़्त की ख़्वाहिश लूट की लालच कमज़ोरों पर ज़ुल्म का शौक़,लेकिन उन का फ़रमाना है मैं इन को जज़्बात लिखूँ| जावेद अख़्तर
-
कैसे वो सदमात लिखूँ!
किस किस की आँखों में देखे मैं ने ज़हर बुझे ख़ंजर,ख़ुद से भी जो मैं ने छुपाए कैसे वो सदमात लिखूँ| जावेद अख़्तर
-
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या!
ग़म नहीं लिक्खूँ क्या मैं ग़म को जश्न लिखूँ क्या मातम को,जो देखे हैं मैं ने जनाज़े क्या उन को बारात लिखूँ| जावेद अख़्तर