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यही तो है फ़र्क़ मुझ!
बस एक मंज़िल है बुल-हवस की हज़ार रस्ते हैं अहल-ए-दिल के,यही तो है फ़र्क़ मुझ में उस में गुज़र गया मैं ठहर गया वो| नासिर काज़मी
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रात भारी थी टल गई!
कुछ अब सँभलने लगी है जाँ भी बदल चला दौर-ए-आसमाँ भी,जो रात भारी थी टल गई है जो दिन कड़ा था गुज़र गया वो| नासिर काज़मी
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जो ज़ख़्म गहरा था!
न अब वो यादों का चढ़ता दरिया न फ़ुर्सतों की उदास बरखा,यूँही ज़रा सी कसक है दिल में जो ज़ख़्म गहरा था भर गया वो| नासिर काज़मी
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ख़ुशी की रुत हो कि!
ख़ुशी की रुत हो कि ग़म का मौसम नज़र उसे ढूँडती है हर दम,वो बू-ए-गुल था कि नग़्मा-ए-जाँ मिरे तो दिल में उतर गया वो| नासिर काज़मी
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माटी के लाल हम!
आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का एक गीत शेयर कर रहा हूँ। निर्धन जी की बहुत सी रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है स्वर्गीय शिशुपाल सिंह निर्धन जी का यह गीत – माटी के लाल हम, भारत के भाल हमहम हैं रहवैया भैया गाँव…
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हैरान कर गया वो!
गए दिनों का सुराग़ ले कर किधर से आया किधर गया वो,अजीब मानूस अजनबी था मुझे तो हैरान कर गया वो| नासिर काज़मी
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जाते हुए वो कोई!
‘शहज़ाद’ ये गिला ही रहा उस की ज़ात से,जाते हुए वो कोई गिला कर नहीं गया| शहज़ाद अहमद
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वैसी ही बे-तलब है!
वैसी ही बे-तलब है अभी मेरी ज़िंदगी,वो ख़ार-ओ-ख़स में आग लगा कर नहीं गया| शहज़ाद अहमद
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रहने दिया न उस ने !
रहने दिया न उस ने किसी काम का मुझे,और ख़ाक में भी मुझ को मिला कर नहीं गया| शहज़ाद अहमद