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इक तीर सा दिल में!
क्या शय थी किसी की पहली नज़र कुछ इस के अलावा याद नहीं,इक तीर सा दिल में जैसे लगा पैवस्त हुआ और टूट गया। शमीम जयपुरी
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तार भी छेड़ा टूट गया!
सोचा था हरीम-ए-जानाँ में नग़्मा कोई हम भी छेड़ सकें,उम्मीद ने साज़-ए-दिल का मगर जो तार भी छेड़ा टूट गया। शमीम जयपुरी
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जब दिल को सुकूँ ही!
जब दिल को सुकूँ ही रास न हो फिर किस से गिला नाकामी का,हर बार किसी का हाथों में आया हुआ दामन छूट गया। शमीम जयपुरी
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दुनिया-ए-मोहब्बत!
दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया,अब क्या है जिस पर नाज़ करें इक दिल था वो भी टूट गया। शमीम जयपुरी
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बहुत से शे’र मुझ से!
बहुत से शे‘र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर, बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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कहीं ऐसा न हो!
नज़र-अंदाज़ कर मुझ को ज़रा सा खुल के जीने दे,कहीं ऐसा न हो तेरी निगहबानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी
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वीराने से मर जाऊँ!
ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं,अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी