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SamaySakshi

A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 5th Jun 2025

    हादसे गुज़रते हैं!

    बिछड़ के तुझ से न जीते हैं और न मरते हैं,अजीब तरह के बस हादसे गुज़रते हैं। कृष्ण बिहारी नूर

  • 5th Jun 2025

    इक तीर सा दिल में!

    क्या शय थी किसी की पहली नज़र कुछ इस के अलावा याद नहीं,इक तीर सा दिल में जैसे लगा पैवस्त हुआ और टूट गया। शमीम जयपुरी

  • 5th Jun 2025

    तार भी छेड़ा टूट गया!

    सोचा था हरीम-ए-जानाँ में नग़्मा कोई हम भी छेड़ सकें,उम्मीद ने साज़-ए-दिल का मगर जो तार भी छेड़ा टूट गया। शमीम जयपुरी

  • 5th Jun 2025

    जब दिल को सुकूँ ही!

    जब दिल को सुकूँ ही रास न हो फिर किस से गिला नाकामी का,हर बार किसी का हाथों में आया हुआ दामन छूट गया। शमीम जयपुरी

  • 5th Jun 2025

    साक़ी के हाथ से!

    साक़ी के हाथ से मस्ती में जब कोई साग़र छूट गया,मय-ख़ाने में ये महसूस हुआ हर मय-कश का दिल टूट गया। शमीम जयपुरी

  • 5th Jun 2025

    दुनिया-ए-मोहब्बत!

    दुनिया-ए-मोहब्बत में हम से हर अपना पराया छूट गया,अब क्या है जिस पर नाज़ करें इक दिल था वो भी टूट गया। शमीम जयपुरी

  • 5th Jun 2025

    शीश पे ढो रही हैं शिलाएँ!

    आज मैं हिंदी के श्रेष्ठ कवि श्री शिव ओम अम्बर जी की एक ग़ज़ल शेयर कर रहा हूँ। अम्बर जी की कुछ रचनाएं मैंने पहले भी शेयर की हैं। लीजिए आज प्रस्तुत है श्री शिव ओम अम्बर जी की यह ग़ज़ल – शीश पे ढो रही हैं शिलाएँ,इन दिनों दुधमुँही गीतिकाएँ। दीमकों के बिलों पे…

  • 4th Jun 2025

    बहुत से शे’र मुझ से!

    बहुत से शे‘र मुझ से ख़ून थुकवाते हैं आमद पर, बहुत मुमकिन है मैं एक दिन ग़ज़ल-ख़्वानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    कहीं ऐसा न हो!

    नज़र-अंदाज़ कर मुझ को ज़रा सा खुल के जीने दे,कहीं ऐसा न हो तेरी निगहबानी से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

  • 4th Jun 2025

    वीराने से मर जाऊँ!

    ग़नीमत है परिंदे मेरी तन्हाई समझते हैं,अगर ये भी न हों तो घर के वीराने से मर जाऊँ| महशर आफ़रीदी

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