-
तर-ब-तर हो जाऊँ!
बड़ी अजीब सी हिद्दत है उस की यादों में,अगर मैं छू लूँ पसीने से तर-ब-तर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
-
मैं अपने झुण्ड से!
मैं आस-पास के मौसम से हूँ तर-ओ-ताज़ा,मैं अपने झुण्ड से निकलूँ तो बे-समर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
-
मैं चाहता हूँ कि!
मिरी मदद से खुजूरों की फ़स्ल पकने लगे,मैं चाहता हूँ कि सहरा की दोपहर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
-
अगर वो छोड़ दे!
ये आब-ओ-ताब जो मुझ में है सब उसी से है,अगर वो छोड़ दे मुझ को तो मैं खंडर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
-
मुझे सँभाल ले!
इससे पहले कि मैं बिखरूँ इधर उधर हो जाऊँ,मुझे सँभाल ले मुमकिन है दर-ब-दर हो जाऊँ| मुनव्वर राना
-
सिसकियाँ उस की न !
सिसकियाँ उस की न देखी गईं मुझ से ‘रा’ना’,रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते| मुनव्वर राना
-
वर्ना हम और तुझे!
इन सिसकते हुए रिश्तों के कहाँ थे क़ाइल,वर्ना हम और तुझे दाग़-ए-जुदाई देते| मुनव्वर राना
-
बंदिशें रोने लगीं!
साथ रहने से भी खिल जाते हैं रिश्तों के कँवल,बंदिशें रोने लगीं मुझ को रिहाई देते| मुनव्वर राना
-
घर में डरते थे!
कहीं बे-नूर न हो जाएँ वो बूढ़ी आँखें,घर में डरते थे ख़बर भी मिरे भाई देते| मुनव्वर राना