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A sky full of cotton beads like clouds

    • 81. सरेआम अमानवीयता
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  • 23rd Nov 2025

    फ़ैसले बदलती हैं!

    ‘वसीम’ आओ इन आँखों को ग़ौर से देखो,यही तो हैं जो मिरे फ़ैसले बदलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 23rd Nov 2025

    बहुत क़रीब हुए !

    बहुत क़रीब हुए जा रहे हो सोचो तो,कि इतनी क़ुर्बतें जिस्मों से कब सँभलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 23rd Nov 2025

    ठुकराओ अब के प्यार करो!

    अपने यूट्यूब चैनल के माध्यम से आज मैं जगजीत सिंह जी की गाई यह ग़ज़ल अपने स्वर में प्रस्तुत कर रहा हूँ- ठुकराओ अब के प्यार करो, मैं नशे में हूँ, जो चाहे मेरे यार करो, मैं नशे में हूँ। आशा है आपको पसंद आएगी, धन्यवाद। *****

  • 23rd Nov 2025

    कहाँ की शम’एँ हैं!

    हमारे बारे में लिखना तो बस यही लिखना,कहाँ की शम’एँ हैं किन महफ़िलों में जलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 23rd Nov 2025

    शाम का गीत!

    आज फिर से अपना एक पुराना नवगीत शेयर कर रहा हूँ, यह नवगीत अंतराल-4 में प्रकाशित हुआ था। जला हुआ लाल कोयलाराख हुआ सूर्य दिन ढले। होली सी खेल गया दिनरीते घट लौटने लगे,दिन भर के चाव लिए मनचाहें कुछ बोल रस पगे,महानगर में उंडेल दूध,गांवों को दूधिए चले।राख हुआ सूर्य दिन ढले।। ला न…

  • 22nd Nov 2025

    सफ़र पे आज वही!

    सफ़र पे आज वही कश्तियाँ निकलती हैं,जिन्हें ख़बर है हवाएँ भी तेज़ चलती हैं| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    जाने किस हाल में!

    आरज़ूओं के बहुत ख़्वाब तो देखो हो ‘वसीम‘, जाने किस हाल में बे-दर्द ज़माना रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    आ ग़म-ए-दोस्त!

    आ ग़म-ए-दोस्त उसी मोड़ पे हो जाऊँ जुदा,जो मुझे मेरा ही रहने दे न तेरा रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    पाँव जमाने न दिए!

    ख़ुश्क मिट्टी ही ने जब पाँव जमाने न दिए,बहते दरिया से फिर उम्मीद कोई क्या रक्खे| वसीम बरेलवी

  • 22nd Nov 2025

    नक़्श अधूरा रक्खे!

    किन शिकस्तों के शब-ओ-रोज़ से गुज़रा होगा,वो मुसव्विर जो हर इक नक़्श अधूरा रक्खे| वसीम बरेलवी

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